भारत -- सैंकड़ों बोलियों का देश
भारतवर्ष बिल्कुल यूरोप जैसा है। जैसे वहाँ अलग-अलग भाषाभाषी और सांस्कृतिक धरोहर वाले देश हैं, वैसे ही हमारे यहाँ भी अलग-अलग राज्य हैं जिनकी अपनी-अपनी भाषाएँ और संस्कृतियाँ हैं।
वैसे तो हर आठ मील पर बोलियाँ बदल जाती हैं और हमारे प्रत्येक राज्य में भी कई बोलियाँ बोली जाती हैं। अब महाराष्ट्र को ही लीजिए… वहाँ मराठी के अलावा चार और बोलियाँ अत्यधिक प्रचलन में हैं, कोंकणी, वन्हाड़ी, अहमदनगरी और मालवणी।
यहाँ तक कि पंजाब, जो हमें आमतौर पर सिर्फ पंजाबी भाषा की याद दिलाता है, वहाँ भी पंजाबी के अलावा तीन-चार अन्य बोलियाँ बोली जाती हैं।
बिहार में मगही बोलने वाला भोजपुरी बोलने की ज़रूरत नहीं समझता। मैथिली बोलने वाले को अंगिका या बज्जिका में महारत हासिल हो, यह भी ज़रूरी नहीं। जैसे उत्तर प्रदेश और राजस्थान में छह-सात बोलियाँ प्रचलित हैं। उत्तर राजस्थान में बोली जाने वाली शेखावाटी को, पश्चिम राजस्थान का वागड़ी बोलने वाला समझ जाए तो वह उसकी छठी इंद्री का कमाल हो सकता है, वरना एक-दूसरे की बोलियाँ समझ पाना आसान नहीं है। भिन्न-भिन्न बोलियाँ बोले जाने के बाद भी वहां के लोग अपने राज्य और वहां के अन्य भाषा भाषियों में भरपूर प्रेम भावना और आसक्ति रखते हैं।
Critical Period Hypothesis (CPH) यह थ्योरी कहती है कि कोई भाषा या बोली आसानी से सीखने की सबसे अच्छी उम्र 0 से 7 वर्ष तक की होती है। Lenneberg (1967) की रिसर्च के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति 13 साल की उम्र के बाद नई भाषा सीखता है, तो उसमें native-like fluency आने की संभावना कम हो जाती है। हालांकि 2018 की एक और रिसर्च में पाया गया कि किसी नई भाषा को सीखने के लिए 17-18 साल की उम्र, 20 साल के वयस्क की तुलना में बेहतर अवस्था मानी जा सकती है। Neuroscience का भी मानना है कि बढ़ती उम्र के साथ किसी भी सांचे में खुद को आसानी से ढाल लेना कठिन होता है, हालांकि, अत्यधिक अभ्यास से सब कुछ संभव है, यह भी उसी का कहना है।
तो ऐसे में, अगर कोई उत्तर प्रदेश का ब्रजभाषी पूरब में जाकर भोजपुरीभाषी से अपनी प्रादेशिक भाषा में संवाद करे, तो जरूरी नहीं कि दोनों की बात एक-दूसरे की समझ में आए। लेकिन चूंकि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड जैसे राज्य ऐसे रहे हैं जहां पढ़ाई-लिखाई की भाषा हिंदी ही रही है, इसलिए बृजभाषा और भोजपुरी बोलने वालों के बीच आपसी बातचीत में न तो कभी कोई कोई कार्य रुकेगा और न ही उनका अहं आहत होगा... क्योंकि कोई भी भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम है और हिंदी वहां यह कार्य पूरा कर रही है ! हाँ, किन्तु महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह समस्या आ सकती है, बल्कि आती भी है। कई मराठीभाषी इस बात से सहमत होंगे कि कोंकण का मछुआरा और विदर्भ का किसान एक-दूसरे की भाषा को अजनबी की तरह महसूस करता है, जब तक कि वे रोज़मर्रा की बातचीत में वो आपस में नियमित संपर्क में न रहें! क्योंकि दो भाषाओं या बोलियों के बीच जितनी ज़्यादा ध्वनि, व्याकरण और शब्दों की दूरी होती है, उन्हें समझना उतना ही मुश्किल होता है। भले ही उन दोनों बोलियों की माँ "मराठी" ही क्यों न हों, और यदि इन दोनों बोलियों में 30-40% तक अलग-अलग शब्दावली या उनके अलग-अलग उच्चारण हों, तो वे एक-दूसरे को "अनजानी बोली" जैसा अनुभव दे सकती हैं। इसलिए, एक ही राज्य के भीतर बोलियाँ इतनी अलग हो सकती हैं कि उन्हें समझने के लिए दिमागी कसरत और कभी-कभी अभ्यास की भी ज़रूरत होती है।
ऐसे में व्यक्ति किसी अन्य राज्य में रहकर जो बात जल्दी से सीख जाता है, वह भाषा नहीं बल्कि वहाँ की सांस्कृतिक धरोहर, खान-पान और जीवनशैली होती है। विदर्भ का व्यक्ति कोकणी क्षेत्र में भाषा सीखने में शायद पूरा जीवन निकाल दे, लेकिन वहाँ का भोजन, उत्सव, पहनावा वह बहुत जल्दी अपना सकता है।
Edward T. Hall के High-context culture सिद्धांत के अनुसार, “सांस्कृतिक व्यवहारों को समझने और अपनाने में शब्दों से अधिक उनके निहित संदर्भ और संकेत मायने रखते हैं।” यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति किसी नई जगह पर जाता है, तो वह वहाँ की भाषा भले ही न सीख पाए, लेकिन त्योहारों, खानपान और सामाजिक ढाँचों को सहज रूप से आत्मसात कर लेता है। यदि इस सिद्धांत की विवेचना करें तो स्पष्ट होता है कि संस्कृति को अपनाना एक अवचेतन प्रक्रिया है, जबकि भाषा को सीखना एक चेतन प्रयास है। भाषा एक कौशल है जिसे बचपन को छोड़ अन्य किसी भी उम्र में सीखना अपेक्षाकृत कठिन कार्य होता है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुम्बई है, जहाँ लगभग 65% लोग गैर-मराठी भाषी हैं, फिर भी वे यहाँ के खानपान, पहनावे, तीज-त्योहारों और सामाजिक व्यवहार को अपनी जीवनशैली में आत्मसात कर चुके हैं। संस्कृति यहां भाषा से पहले समाहित होती है। इसका जीवंत प्रमाण है कि कई मुस्लिम मोहल्लों में भी गणपति उत्सव के दौरान 'बप्पा' की मूर्ति पूरे हर्षोल्लास से लाई जाती है। यह भागीदारी धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता से प्रेरित होती है।
अब फिर से यूरोप पर लौटते हैं। मान लीजिए, अगर यूरोप का क्षेत्रफल 100 है, तो भारत का क्षेत्रफल लगभग उसका एक-तिहाई यानी 33 है। यूरोप में लगभग 44 देश हैं, जबकि भारत में कुल 36 राज्य (राज्य और केंद्रशासित प्रदेश मिलाकर) हैं। यानी संख्या के लिहाज़ से भारत यूरोप से बहुत पीछे नहीं है, पर आकार में सिर्फ एक-तिहाई ही है। अगर केवल क्षेत्रफल और विविधता के आधार पर किसी इकाई को "देश" माना जाए, तो भारत के राज्य भी देश कहलाने के थोड़े बहुत तो दावेदार हो ही सकते हैं। लेकिन यही तो भारत की संघीय व्यवस्था की खूबी है कि इतनी विविधता को समेटते हुए भी वह एक राष्ट्र के रूप में संगठित है और यही कारण है कि हमारे संविधान ने अनुच्छेद 19 (1) (a) में "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी, यानी हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह भारत में कहीं भी अपनी मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा या किसी भी भाषा में बोल सकता है। यदि कोई आपकी भाषा न समझे तो यह सामाजिक चुनौती हो सकती है लेकिन संवैधानिक रूप से किसी नागरिक पर कोई भाषाई बाध्यता नहीं है।
अगर आप ओडिशा से हैं और महाराष्ट्र, कर्नाटक या तमिलनाडु जैसे किसी राज्य में रह रहे हैं और अपनी मातृभाषा ‘उड़िया’ बोल रहे हैं, तो कोई आपको स्थानीय भाषा मराठी, कन्नड़ या तमिल बोलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, जब तक कि वह कोई प्रशासनिक आवश्यकता न हो, जैसे कोई परीक्षा, दस्तावेज़ी प्रक्रिया या सरकारी संचार। उसी तरह, यदि कोई मराठी, कन्नड़ या तमिल भाषी व्यक्ति अपने ही राज्य में अपनी भाषा में आपसे संवाद करता है, तो आप उससे यह नहीं कह सकते कि “उड़िया बोलो!” ऐसे में आप अपनी भाषा बोलिए, वो अपनी । लेकिन तब आपसी संवाद की स्पष्टता कितनी होगी, यह एक अलग सवाल है और यही कारण है कि ऐसी कमियां दूर करने के लिए एक साझा, तृतीय भाषा की आवश्यकता महसूस होती है, जो हर राज्य में समान रूप से पढ़ाई और समझी जाती हो। ताकि जब कोई व्यक्ति नौकरी, स्थानांतरण या व्यापार के सिलसिले में अपने राज्य से किसी दूसरे राज्य में जाए तो संवाद में रुकावट न आने पाए। अब तक यह काम अनौपचारिक रूप से हिंदी (लगभग 80%) और अंग्रेज़ी (लगभग 20%) निभा रही हैं। लेकिन जैसे ही इसे औपचारिक रूप से स्वीकार करने की बात आती है, आश्चर्यजनक रूप से 20% वाली भाषा, यानी अंग्रेज़ी, सबसे आगे बढ़ती नज़र आती है और सबसे बड़ी विडंबना इसमें यह है कि उस समय उसके समर्थन में वे लोग भी खड़े हो जाते हैं जो न तो उस भाषा में दक्ष हैं, न ही उसका दैनिक जीवन में कोई प्रयोग करते हैं।
यूरोप में अधिकांश देशों की अपनी-अपनी मुद्रा थी, फिर भी उन्होंने यूरो को सहर्ष अपनाया और आर्थिक एकता का मार्ग प्रशस्त किया। यदि भारत में सभी राज्य, इसी भावना से प्रेरित होकर हिंदी को ‘लिंग्वा फ्रैंका’ (साझा संपर्क भाषा) के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारी भाषाई विविधता, हमारे लिए बाधा नहीं बल्कि ताकत बन सकती है। क्योंकि अहिंदी राज्य अनजाने में या जानते-बुझते अपनी राज्य की प्रथम भाषा को लेकर इस प्रक्रिया को अमल में लाते ही हैं, तभी तो पूरे महाराष्ट्र में एक तरह की किताबी मराठी पढ़ाई-लिखाई जाती है, ताकि जब राज्य के इस कोने का व्यक्ति सुदूर दूसरे कोने में जाये तो सम्प्रेषण के लिए उसके पास मराठी हो भले ही वो स्थानीय बोली नहीं जानता हो! इस संदर्भ में देखें तो विभिन्न बोलियां बोलने वाले अहिंदी राज्यों की ‘लिंग्वा फ्रैंका’ (साझा संपर्क भाषा) उनकी वो भाषा हुई जो ज़्यादा बोली जाती हो और पढ़ाई लिखाई की भाषा भी हो! इस विचार को मजबूती देती हुई यह बात भी समझिए कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बोली जाने वाली बोलियों का इतिहास किसी भी तरह से कमज़ोर नहीं रहा है। इन सभी बोली-भाषाओं में गद्य, पद्य, साहित्य और इतिहास रचा गया है और खूब पढ़ा गया है, जैसा मराठी, तमिल और कन्नड़ में हुआ है। लेकिन फिर भी इन राज्यों ने हिंदी को निर्विरोध अपने यहां पढ़ाई-लिखाई की भाषा ही नहीं बनाया, बल्कि अपनी बोलियों के साथ-साथ हिंदी को सहर्ष अपनाया और यदि यही भावना भारत भर में फैले, तो देश की भाषिक विविधता एक सशक्त राष्ट्रीय पूंजी बन सकती है, न कि विभाजन की रेखा।
इसलिए इसी तर्ज पर बाकी राज्यों को भी चाहिए कि दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेज़ी की जगह हिंदी को प्राथमिकता दें, क्योंकि यह भाषा भी उसी संस्कृत से निकली है जो आपकी मातृभाषा की जननी है जबकि अंग्रेज़ी एक पूर्णतः विदेशी भाषा है और उसकी तरफ़दारी करना ऐसा लगता है जैसे हम अब भी अंग्रेज़ों के मानसिक गुलाम हैं।
इस पूरे तथ्यात्मक दृष्टिकोण के बावजूद यदि किसी को अब भी लगता है कि “नहीं, हमारे यहाँ रहना है तो हमारी ही भाषा बोलनी होगी”, तो यह विचार न केवल संविधान की भावना के विरुद्ध है, बल्कि भारत की एकता के भी विपरीत है। हमारे देश की सुंदरता उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में है, और उस विविधता को जोड़ने वाला सेतु हमारी साझा संवैधानिक भाषा हिंदी हो सकती है। यदि ज़िद के चलते कोई इस तथ्य को नहीं स्वीकार करना चाहता, तो ऐसे में उसके लिए केवल एक ही रास्ता बचता है.. भारत से कटकर अलग हो जाना और राजद्रोह के कलंक से स्वयं को गुज़ारते हुए एक स्वतंत्र देश घोषित कर लेना। क्योंकि इस दिशा में की गई उसकी अन्य सभी कोशिशें विफल होंगी, क्योंकि देश अभी ज़िंदा है, और उसका संविधान भी ज़िंदा है। जय हिंद !!!
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