शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

भारत - सैंकडों बोलियों का देश

भारत -- सैंकड़ों बोलियों का देश 

भारतवर्ष बिल्कुल यूरोप जैसा है। जैसे वहाँ अलग-अलग भाषाभाषी और सांस्कृतिक धरोहर वाले देश हैं, वैसे ही हमारे यहाँ भी अलग-अलग राज्य हैं जिनकी अपनी-अपनी भाषाएँ और संस्कृतियाँ हैं।

वैसे तो हर आठ मील पर बोलियाँ बदल जाती हैं और हमारे प्रत्येक राज्य में भी कई बोलियाँ बोली जाती हैं। अब महाराष्ट्र को ही लीजिए… वहाँ मराठी के अलावा चार और बोलियाँ अत्यधिक प्रचलन में हैं, कोंकणी, वन्हाड़ी, अहमदनगरी और मालवणी।

यहाँ तक कि पंजाब, जो हमें आमतौर पर सिर्फ पंजाबी भाषा की याद दिलाता है, वहाँ भी पंजाबी के अलावा तीन-चार अन्य बोलियाँ बोली जाती हैं।

बिहार में मगही बोलने वाला भोजपुरी बोलने की ज़रूरत नहीं समझता। मैथिली बोलने वाले को अंगिका या बज्जिका में महारत हासिल हो, यह भी ज़रूरी नहीं।  जैसे उत्तर प्रदेश और राजस्थान में छह-सात बोलियाँ प्रचलित हैं। उत्तर राजस्थान में बोली जाने वाली शेखावाटी को, पश्चिम राजस्थान का वागड़ी बोलने वाला समझ जाए तो वह उसकी छठी इंद्री का कमाल हो सकता है, वरना एक-दूसरे की बोलियाँ समझ पाना आसान नहीं है। भिन्न-भिन्न बोलियाँ बोले जाने के बाद भी वहां के लोग अपने राज्य और वहां के अन्य भाषा भाषियों में भरपूर प्रेम भावना और आसक्ति रखते हैं।

Critical Period Hypothesis (CPH) यह थ्योरी कहती है कि कोई भाषा या बोली आसानी से सीखने की सबसे अच्छी उम्र 0 से 7 वर्ष तक की होती है। Lenneberg (1967) की रिसर्च के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति 13 साल की उम्र के बाद नई भाषा सीखता है, तो उसमें native-like fluency आने की संभावना कम हो जाती है। हालांकि 2018 की एक और रिसर्च में पाया गया कि किसी नई भाषा को सीखने के लिए 17-18 साल की उम्र, 20 साल के वयस्क की तुलना में बेहतर अवस्था मानी जा सकती है। Neuroscience का भी मानना है कि बढ़ती उम्र के साथ किसी भी सांचे में खुद को आसानी से ढाल लेना कठिन होता है, हालांकि, अत्यधिक अभ्यास से सब कुछ संभव है, यह भी उसी का कहना है।

तो ऐसे में, अगर कोई उत्तर प्रदेश का ब्रजभाषी पूरब में जाकर भोजपुरीभाषी से अपनी प्रादेशिक भाषा में संवाद करे, तो जरूरी नहीं कि दोनों की बात एक-दूसरे की समझ में आए। लेकिन चूंकि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड जैसे राज्य ऐसे रहे हैं जहां पढ़ाई-लिखाई की भाषा हिंदी ही रही है, इसलिए बृजभाषा और भोजपुरी बोलने वालों के बीच आपसी बातचीत में न तो कभी कोई कोई कार्य रुकेगा और न ही उनका अहं आहत होगा... क्योंकि कोई भी भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम है और हिंदी वहां यह कार्य पूरा कर रही है ! हाँ, किन्तु महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह समस्या आ सकती है, बल्कि आती भी है। कई मराठीभाषी इस बात से सहमत होंगे कि कोंकण का मछुआरा और विदर्भ का किसान एक-दूसरे की भाषा को अजनबी की तरह महसूस करता है, जब तक कि वे रोज़मर्रा की बातचीत में वो आपस में नियमित संपर्क में न रहें!  क्योंकि दो भाषाओं या बोलियों के बीच जितनी ज़्यादा ध्वनि, व्याकरण और शब्दों की दूरी होती है, उन्हें समझना उतना ही मुश्किल होता है। भले ही उन दोनों बोलियों की माँ "मराठी" ही क्यों न हों, और यदि इन दोनों बोलियों में 30-40% तक अलग-अलग शब्दावली या उनके अलग-अलग उच्चारण हों, तो वे एक-दूसरे को "अनजानी बोली" जैसा अनुभव दे सकती हैं। इसलिए, एक ही राज्य के भीतर बोलियाँ इतनी अलग हो सकती हैं कि उन्हें समझने के लिए दिमागी कसरत और कभी-कभी अभ्यास की भी ज़रूरत होती है।

ऐसे में व्यक्ति किसी अन्य राज्य में रहकर जो बात जल्दी से सीख जाता है, वह भाषा नहीं बल्कि वहाँ की सांस्कृतिक धरोहर, खान-पान और जीवनशैली होती है। विदर्भ का व्यक्ति कोकणी क्षेत्र में भाषा सीखने में शायद पूरा जीवन निकाल दे, लेकिन वहाँ का भोजन, उत्सव, पहनावा वह बहुत जल्दी अपना सकता है।

Edward T. Hall के High-context culture सिद्धांत के अनुसार, “सांस्कृतिक व्यवहारों को समझने और अपनाने में शब्दों से अधिक उनके निहित संदर्भ और संकेत मायने रखते हैं।” यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति किसी नई जगह पर जाता है, तो वह वहाँ की भाषा भले ही न सीख पाए, लेकिन त्योहारों, खानपान और सामाजिक ढाँचों को सहज रूप से आत्मसात कर लेता है। यदि इस सिद्धांत की विवेचना करें तो स्पष्ट होता है कि संस्कृति को अपनाना एक अवचेतन प्रक्रिया है, जबकि भाषा को सीखना एक चेतन प्रयास है। भाषा एक कौशल है जिसे बचपन को छोड़ अन्य किसी भी उम्र में सीखना अपेक्षाकृत कठिन कार्य होता है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुम्बई है, जहाँ लगभग 65% लोग गैर-मराठी भाषी हैं, फिर भी वे यहाँ के खानपान, पहनावे, तीज-त्योहारों और सामाजिक व्यवहार को अपनी जीवनशैली में आत्मसात कर चुके हैं। संस्कृति यहां भाषा से पहले समाहित होती है। इसका जीवंत प्रमाण है कि कई मुस्लिम मोहल्लों में भी गणपति उत्सव के दौरान 'बप्पा' की मूर्ति पूरे हर्षोल्लास से लाई जाती है। यह भागीदारी धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता से प्रेरित होती है।

अब फिर से यूरोप पर लौटते हैं। मान लीजिए, अगर यूरोप का क्षेत्रफल 100 है, तो भारत का क्षेत्रफल लगभग उसका एक-तिहाई यानी 33 है। यूरोप में लगभग 44 देश हैं, जबकि भारत में कुल 36 राज्य (राज्य और केंद्रशासित प्रदेश मिलाकर) हैं। यानी संख्या के लिहाज़ से भारत यूरोप से बहुत पीछे नहीं है, पर आकार में सिर्फ एक-तिहाई ही है। अगर केवल क्षेत्रफल और विविधता के आधार पर किसी इकाई को "देश" माना जाए, तो भारत के राज्य भी देश कहलाने के थोड़े बहुत तो दावेदार हो ही सकते हैं। लेकिन यही तो भारत की संघीय व्यवस्था की खूबी है कि इतनी विविधता को समेटते हुए भी वह एक राष्ट्र के रूप में संगठित है और यही कारण है कि हमारे संविधान ने अनुच्छेद 19 (1) (a) में "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी, यानी हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह भारत में कहीं भी अपनी मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा या किसी भी भाषा में बोल सकता है। यदि कोई आपकी भाषा न समझे तो यह सामाजिक चुनौती हो सकती है लेकिन संवैधानिक रूप से किसी नागरिक पर कोई भाषाई बाध्यता नहीं है।

अगर आप ओडिशा से हैं और महाराष्ट्र, कर्नाटक या तमिलनाडु जैसे किसी राज्य में रह रहे हैं और अपनी मातृभाषा ‘उड़िया’ बोल रहे हैं, तो कोई आपको स्थानीय भाषा मराठी, कन्नड़ या तमिल बोलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, जब तक कि वह कोई प्रशासनिक आवश्यकता न हो, जैसे कोई परीक्षा, दस्तावेज़ी प्रक्रिया या सरकारी संचार। उसी तरह, यदि कोई मराठी, कन्नड़ या तमिल भाषी व्यक्ति अपने ही राज्य में अपनी भाषा में आपसे संवाद करता है, तो आप उससे यह नहीं कह सकते कि “उड़िया बोलो!” ऐसे में आप अपनी भाषा बोलिए, वो अपनी । लेकिन तब आपसी संवाद की स्पष्टता कितनी होगी, यह एक अलग सवाल है और यही कारण है कि ऐसी कमियां दूर करने के लिए एक साझा, तृतीय भाषा की आवश्यकता महसूस होती है, जो हर राज्य में समान रूप से पढ़ाई और समझी जाती हो। ताकि जब कोई व्यक्ति नौकरी, स्थानांतरण या व्यापार के सिलसिले में अपने राज्य से किसी दूसरे राज्य में जाए तो संवाद में रुकावट न आने पाए। अब तक यह काम अनौपचारिक रूप से हिंदी (लगभग 80%) और अंग्रेज़ी (लगभग 20%) निभा रही हैं। लेकिन जैसे ही इसे औपचारिक रूप से स्वीकार करने की बात आती है, आश्चर्यजनक रूप से 20% वाली भाषा, यानी अंग्रेज़ी, सबसे आगे बढ़ती नज़र आती है और सबसे बड़ी विडंबना इसमें यह है कि उस समय उसके समर्थन में वे लोग भी खड़े हो जाते हैं जो न तो उस भाषा में दक्ष हैं, न ही उसका दैनिक जीवन में कोई प्रयोग करते हैं।

यूरोप में अधिकांश देशों की अपनी-अपनी मुद्रा थी, फिर भी उन्होंने यूरो को सहर्ष अपनाया और आर्थिक एकता का मार्ग प्रशस्त किया। यदि भारत में सभी राज्य, इसी भावना से प्रेरित होकर हिंदी को ‘लिंग्वा फ्रैंका’ (साझा संपर्क भाषा) के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारी भाषाई विविधता, हमारे लिए बाधा नहीं बल्कि ताकत बन सकती है। क्योंकि अहिंदी राज्य अनजाने में या जानते-बुझते अपनी राज्य की प्रथम भाषा को लेकर इस प्रक्रिया को अमल में लाते ही हैं, तभी तो पूरे महाराष्ट्र में एक तरह की किताबी मराठी पढ़ाई-लिखाई जाती है, ताकि जब राज्य के इस कोने का व्यक्ति सुदूर दूसरे कोने में जाये तो सम्प्रेषण के लिए उसके पास मराठी हो भले ही वो स्थानीय बोली नहीं जानता हो! इस संदर्भ में देखें तो विभिन्न बोलियां बोलने वाले अहिंदी राज्यों की ‘लिंग्वा फ्रैंका’ (साझा संपर्क भाषा) उनकी वो भाषा हुई जो ज़्यादा बोली जाती हो और पढ़ाई लिखाई की भाषा भी हो! इस विचार को मजबूती देती हुई यह बात भी समझिए कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बोली जाने वाली बोलियों का इतिहास किसी भी तरह से कमज़ोर नहीं रहा है। इन सभी बोली-भाषाओं में गद्य, पद्य, साहित्य और इतिहास रचा गया है और खूब पढ़ा गया है, जैसा मराठी, तमिल और कन्नड़ में हुआ है। लेकिन फिर भी इन राज्यों ने हिंदी को निर्विरोध अपने यहां पढ़ाई-लिखाई की भाषा ही नहीं बनाया, बल्कि अपनी बोलियों के साथ-साथ हिंदी को सहर्ष अपनाया और यदि यही भावना भारत भर में फैले, तो देश की भाषिक विविधता एक सशक्त राष्ट्रीय पूंजी बन सकती है, न कि विभाजन की रेखा।

इसलिए इसी तर्ज पर बाकी राज्यों को भी चाहिए कि दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेज़ी की जगह हिंदी को प्राथमिकता दें, क्योंकि यह भाषा भी उसी संस्कृत से निकली है जो आपकी मातृभाषा की जननी है जबकि अंग्रेज़ी एक पूर्णतः विदेशी भाषा है और उसकी तरफ़दारी करना ऐसा लगता है जैसे हम अब भी अंग्रेज़ों के मानसिक गुलाम हैं।

इस पूरे तथ्यात्मक दृष्टिकोण के बावजूद यदि किसी को अब भी लगता है कि “नहीं, हमारे यहाँ रहना है तो हमारी ही भाषा बोलनी होगी”, तो यह विचार न केवल संविधान की भावना के विरुद्ध है, बल्कि भारत की एकता के भी विपरीत है। हमारे देश की सुंदरता उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में है, और उस विविधता को जोड़ने वाला सेतु हमारी साझा संवैधानिक भाषा हिंदी हो सकती है। यदि ज़िद के चलते कोई इस तथ्य को नहीं स्वीकार करना चाहता, तो ऐसे में उसके लिए केवल एक ही रास्ता बचता है.. भारत से कटकर अलग हो जाना और राजद्रोह के कलंक से स्वयं को गुज़ारते हुए एक स्वतंत्र देश घोषित कर लेना। क्योंकि इस दिशा में की गई उसकी अन्य सभी कोशिशें विफल होंगी, क्योंकि देश अभी ज़िंदा है, और उसका संविधान भी ज़िंदा है। जय हिंद !!!


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शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

मी बॉम्बे आहे !!!

मी बॉम्बे आहे !!! 

1955 – बॉम्बे सचिवालय – मुख्यमंत्री कार्यालय

मुख्य पात्र: CM मोरारजी देसाई (55 वर्ष),मुख्य सचिव श्री खन्ना (60 वर्ष), निज सचिव (30 वर्ष)

(बड़ी खिड़की से समुद्र की तरफ देखता एक सुसज्जित कमरा। कमरे में गहरी चुप्पी है, हवा में घुटन है। बाहर नारियल के पेड़ झूम रहे हैं। सीएम मोरारजी खिड़की के पास खड़े हैं, हाथ में फाइल। आंखें समंदर में कहीं गुम हैं। चाय का प्याला मेज़ पर ठंडा हो गया है।)


(दरवाज़ा हल्के से खटखटता है)

PS: सर… दिल्ली से टेलीग्राम आया है। बहुत अहम है।

(सीएम सिर घुमाते हैं। पीएस आगे बढ़कर लिफाफा मेज़ पर रखता है। मोरारजी पढ़ते हैं। कमरे में सन्नाटा।)

CM (धीरे से): “Bombay to be considered for Union Territory status.” (एक क्षण रुककर) तो दिल्ली को अब बॉम्बे चाहिए… वो इसे अपने दफ्तर से चलाना चाहती है?

(मुख्य सचिव भीतर आते हैं)

CM: मुख्य सचिव जी, आपने पढ़ा?

मुख्य सचिब: जी सर।

CM: जड़ काट देने से पेड़ कभी फलता-फूलता देखा है आपने?

मुख्य सचिव: सर, केंद्र का मानना है कि बॉम्बे अगर महाराष्ट्र को मिला, तो यहाँ के अन्य भाषी समुदायों में असंतोष फैलेगा...

CM (बीच में ही): गुजराती विरोध करेंगे... पंजाबी, बंगाली, राजस्थानी… सबकी अलग मांगें उठेंगी!!! और अगर उल्टा हुआ?

मुख्य सचिव: तो मराठी आंदोलन और तेज़ हो जाएगा।

CM: तो दिल्ली को इसका हल यही सूझा है कि बॉम्बे को काटकर एक बॉक्स में बंद कर दिया जाए?

मुख्य सचिव: दिल्ली कहती है कि ये शहर सबका है… इसलिए किसी एक का न रहे।

CM (कटाक्ष के साथ): जो सबका हो, वो अक्सर किसी का नहीं होता मुख्य सचिव जी!

मुख्य सचिव: केंद्र बॉम्बे को राष्ट्रीय संपत्ति मानते हुए इसके तटस्थ रहने की वकालत करता है! 

CM: संपत्ति? बॉम्बे कोई गोदाम नहीं है। यहाँ लोग रहते हैं… जो बोलते हैं, सोचते हैं, लड़ते हैं, त्योहार मनाते हैं। यह शहर सिर्फ़ व्यापार से नहीं बना। मराठी माणूस ने इसे अपनी संस्कृति, अस्मिता और भाषा से सींचा है। (रुकते हैं) और सिर्फ व्यापार की बुनियाद पर अगर शहर चलते, तो आज भी देश की राजधानी कलकत्ता होती।

मुख्य सचिव: सर, ये कोई अंतिम निर्णय नहीं है... सिर्फ सिफारिश है!

CM: सिफारिश ही तो वो पहला पत्थर होती है.. जिससे सुदृढ इमारतें भी ढहाई जा सकती हैं। 

(टेबल की ओर बढ़ते हैं, ठंडा पड़ा चाय का प्याला देखते हैं)

CM (धीरे, पर दृढ़ता से): मुख्य सचिव जी, शिवाजी महाराज एक सच्चे मराठी थे, मराठी अस्मिता की लड़ाई में उन्होंने कभी दूसरे की भाषा, संस्कृति का अपमान नहीं किया ! उनके राज्य में सभी भाषा-भाषी, सभी धर्मावलंबी एक साथ सुख से जिये ! तो सच्चा मराठी जब अपनी लड़ाई लड़ता है तो किसी दूसरी को नीचा करके नहीं बल्कि सबको साथ लेकर लड़ता है,-इसलिए दिल्ली को स्पष्ट जवाब दीजिए… शिवाजी महाराज की मराठी अस्मिता का परचम उठाकर चलने वाला यह मानुस झुकेगा नहीं, अपनी पहचान कभी मिटने नहीं देगा यह मराठी मानुस!!

मुख्य सचिव - जी sir (जाने लगता है, अचानक मुड़ता है) sir.. एक व्यक्तिगत प्रश्न करूँ?

CM: जी जी, पूछिये

मुख्य सचिव - क्या बदलाव हमेशा अच्छे होते है?

CM: बदलाव अच्छे-बुरे नहीं होते, बस ज़रूरी होते हैं! 

मुख्य सचिव: और ये ज़रूरी बदलाव आज से 50 साल बाद कितने ज़रूरी होंगे यह हम आप आज कल्पना कर सकते हैं?

CM: हर समाज को अपने समय में जीना होता है। आज जो ज़रूरी है, वही हमारी जिम्मेदारी है। आने वाला समय अपने फैसले खुद करेगा, जैसे हमें करने हैं, अभी और यहीं।"

मुख्य सचिव - जी sir तो मै तार का जवाब रेडी करता हूँ।

CM: बेहतर..

(यह वार्तालाप काल्पनिक है, लेकिन घटनाक्रम तकरीबन यही था)


मंगलवार, 1 जुलाई 2025

दुश्मन भाई

"दुश्मन भाई"

कभी एक मोहल्ले में दो भाई एक साथ रहते थे। बचपन साथ गुज़रा, पतंगें साथ उड़ाईं, कंचे साथ खेले। फिर एक दिन ऐसी लड़ाई हुई कि आंगन के बीचोंबीच दीवार खिंच गई। दोनों ने एक-दूसरे की शक्ल देखना बंद कर दिया।

बड़े के घर में यदाकदा छोटे की धमकियों भरी आवाज़ सुनाई देती तो कभी बड़े को छोटे की मज़ाक उड़ाते देखा जाता। इनकी बीवियां भी कम नहीं थीं, दोनों तरफ के बढ़ते बच्चों के दिमाग़ में दिन-रात ज़हर भरती रहतीं। लिहाज़ा, बच्चे भी समय के साथ "परिवारधर्म पालक" बन चुके थे।

कभी दोनों तरफ का कोई बच्चा अपने चचेरे भाई को हल्की-सी "हाय-हेलो" कह देता, तो पूरा परिवार उसे "परिवारद्रोही" करार देकर या तो फैमिली वॉट्सऐप ग्रुप पर लताड़ता या फिर सीधे ग्रुप से बाहर निकाल फेंकता।

मोहल्ले में इनके घर से पश्चिम दिशा में रहने वाले “भूरे अंकल” मोहल्ले के चौधरी बनने के प्रयास में अक्सर इन दोनों के बीच बीच-बचाव, माफी-सुलह करवाने की कोशिश करते, इतने अमीर आदमी की दखल से दोनों भाई एक बार को दुश्मनी भूल भी जाते और बल्कि इसे "भूरे अंकल" के बड़े बंगले के स्विमिंग पूल में डुबकी लगाने का सुनहरा मौका समझते। दोनों के बीच छोटी-मोटी सुलह भी हो जाने और पूल में संग नहाने के बाद भी छोटा भाई अक्सर अपनी औकात भूल जाता और दोनों घरों के बीच की दीवार पर चप्पल, जूते और पत्थरों की बौछार के साथ बड़े भाई की तारीफ़ में मोटी-मोटी गालियाँ देने लगता।

इस बार फिर 'भूरे अंकल' के बीच-बचाव से रिश्ते सुधरने लगे थे.. इस बार रिश्ते ऐसे सुधरे कि जैसे कोई पुराना घरोपा सा लौट आया हो। अचार की बरनियाँ इधर-उधर होने लगीं। बच्चे एक-दूसरे के साथ घूमने-फिरने लगे। दोनों घरों की बेटियाँ, जो अच्छा खाना बना लेती थीं, उन्होंने मिलकर छोटा-मोटा खाने का बिज़नेस शुरू कर दिया। बीवियाँ भी गॉसिप के समय से कुछ पल चुराकर आपस में मिलने लगीं।

इन छोटे बदलाओं के साथ-साथ कुछ बड़ी बातें भी हुई! एक तो छोटे भाई की छोटी साली से बड़े भाई के बड़े बेटे की शादी तय हो गई दूसरा मोहल्ले की “ओल्ड-एज्ड क्रिकेट टीम” में दोनों भाई एक साथ-एक टीम में खेलने लगे। 

बहुत ही आनंद के दिन थे वो। "परिवार धर्म" की जगह अब "समाज धर्म" ने ले ली थी। शादी की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं प्री-वेडिंग शूट हो गया था। सगाई की तारीख़ नज़दीक थी.....और फिर एक दिन, छोटे भाई ने फिर अपनी औकात दिखा दी!  शराब के नशे में उसने बड़े भाई को भर-भर के गालियाँ दीं जूते-चप्पलों से दीवार काली कर दी और अचानक उसके घर आ पहुँचे बड़े भाई के नन्हे-मुन्ने दोहते-दोहिती को दो झापड़ भी रसीद कर दिए।

अब बताइए, नशा कैसा भी हो, कितनी बुरी चीज़ है! एक झटके में सब खत्म कर देता है और इस बार कर भी दिया… बड़े भैया बहुत ज़्यादा हर्ट हो गए थे। थप्पड़ की गूंज उनके कानों में बजने लगी थी। पहले कुछ दिन जवाबी कारवाही में जूते-चप्पल और गालियों से छोटे भाई की दीवार की शोभा बढ़ाई गई, फिर जब मन नहीं भरा तो बड़े भाई ने फैसला किया : 

बेटे की शादी रद्द! 

बेटी का बिजनेस बंद! 

और सभी बच्चों को निर्देश: “कजिन्स से मिलना-जुलना बंद। वरना वॉट्सएप ग्रुप से निष्कासित कर दिए जाओगे और घर में दिन-रात ट्रोल भी होगे सो अलग!”

'भूरे अंकल' ने बहुत समझाया, तो बड़े भाई थोड़ा शांत तो हो गए लेकिन जो नियम उन्होंने बना दिए, उनसे कभी मुख नहीं मोड़ा। बड़ा बेटा अब दिन-रात चुपके-चुपके मोबाइल म्यूट कर के अपनी प्री-वेडिंग फिल्म देखता, लेकिन उसे तो अब उस दिन का इंतज़ार था जब वो इस फ़िल्म को पूरे परिवार के सामने रिलीज़ कर पाएगा और जब उसने उसी लड़की से शादी की जिद की तो उसे "परिवार विरोधी" घोषित कर वॉट्सएप ग्रुप से निकाल दिया गया। अब उसे दिन-रात ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा था, खासकर उन भाई-बहनों से जो कुछ हफ्ते पहले ही अपने चाचा के घर खाना लपेटकर लाए थे, पिछले महीने रोके के रंगारंग कार्यक्रम में नाचे थे और अब अलमारी में शगुन की सौगातों को छिपाकर, दुनिया के सामने "परिवार धर्म" का झंडा उठाए खड़े थे। कई तो इतने आक्रोशित थे कि अगर वो उनका सगा भाई न होता तो उसे चौराहे पर पीट देते, अगर उस पिटाई से समाज में कोई “सकारात्मक संदेश” जाता तो! अफसोस, लेकिन ऐसा हुआ नहीं ! किन्तु ट्रोलिंग तो उनके हाथ में थी और उसमें कोई कसर न छोड़ी गई।

बेटी ने तो बिजनेस में लगी पूँजी, मार्केट में बिगड़ी इमेज और प्रॉफिट का हिस्सा पाने की उम्मीद छोड़ ही दी थी। बस एक छोटी सी आशा थी कि अगर कभी भाईचारा लौटे, तो अटका पैसा निकल आए। बड़ा बेटा भी बस यही सपना देखता कि सब कुछ ठीक हो जाए। शादी में चाहे कितना ही डिले हो जाये, बस अभी कम से कम इतना हो कि वो अपने परिवार के बीच बैठकर प्री-वेडिंग फिल्म शान से दिखा पाए। ...लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। और फिर… कुछ ही हफ्तों बाद मोहल्ले का “वार्षिक क्रिकेट टूर्नामेंट” शुरू होने की खबर आई!

सारे गुस्से, बायकॉट, परिवार भक्ति, दीवारें सब भुला दी गई दोनों भाई भी हमेशा की तरह उस टूर्नामेंट का हिस्सा बने। इस बार भूरे अंकल को टूर्नामेंट और भी मज़ेदार बनाना था और साथ ही टिकट भी ज़्यादा बिकवाने थे। तो उन्होंने दोनों भाइयों को एक टीम में नहीं, आमने-सामने मैदान में उतार दिया!

चारों तरफ़ पोस्टर लग गए:  “आज शाम 7 बजे देखिए, बड़ा भाई बनाम छोटा भाई! लाइव, धमाकेदार, अपने परिवार की आन-बान-शान के लिए मुकाबला!”

“अंकल भूरे” भरपूर टिकट बेचने में लग गए। पड़ोस की आंटी कहती हैं  “हमें क्या लेना-देना? हमें तो बस इन्हें लड़ता हुआ... मेरा मतलब खेलते हुए देखना अच्छा लगता है।” मोहल्ले के कुछ लफंगे चुपचाप ऑनलाइन सट्टा लगाने लगे इस सवाल के साथ कि “कौन जीतेगा?”

बड़ा बेटा फुसफुसाया:  “जब क्रिकेट खेल सकते हैं, तो मेरी प्री-वेडिंग फिल्म क्यों बैन?” बेटियों के मन में भी आया:  “क्रिकेट खेला जा रहा है और हमारा बिजनेस अटका पड़ा है.. ये कैसा न्याय है?” लेकिन किसी ने ज़ोर से कुछ नहीं कहा। क्योंकि बोलते ही बाकी परिवार जनों की “परिवार भक्ति” जाग जाती और वे इन्हें “परिवारद्रोही” घोषित करके ट्रोल करने लगते।

'भूरे अंकल' ये सब समझ गए। मुस्कराकर बोले: बेटा, तेरी प्री-वेडिंग फिल्म से भावना आहत होती है… लेकिन क्रिकेट से भावना उबाल मारती है। यही फ़र्क है और यही सबसे बड़ा फ़र्क है। 

भले ही इस क्रिकेट मैच से कुछ परिवारजन आहत थे, लेकिन बाकी के सभी सदस्य तो उत्साहित थे और इसीलिए बड़ा बेटा और बेटी अपनी अधूरी ज़िंदगी की उलझनों के बीच, मोहल्ले के मैदान में पिताजी को चीयर अप करने घर से निकल गए,  रास्ते में जाते हुए पानी की टंकी पर तीन-चार लोग मिलकर एक होर्डिंग सेट कर रहे थे, जिस पर लिखा था: “2025 मैन एशिया कप (T20I) ” देखिए भारत-पाक का जंगी मुक़ाबला"