मी बॉम्बे आहे !!!
1955 – बॉम्बे सचिवालय – मुख्यमंत्री कार्यालय
मुख्य पात्र: CM मोरारजी देसाई (55 वर्ष),मुख्य सचिव श्री खन्ना (60 वर्ष), निज सचिव (30 वर्ष)
(बड़ी खिड़की से समुद्र की तरफ देखता एक सुसज्जित कमरा। कमरे में गहरी चुप्पी है, हवा में घुटन है। बाहर नारियल के पेड़ झूम रहे हैं। सीएम मोरारजी खिड़की के पास खड़े हैं, हाथ में फाइल। आंखें समंदर में कहीं गुम हैं। चाय का प्याला मेज़ पर ठंडा हो गया है।)
(दरवाज़ा हल्के से खटखटता है)
PS: सर… दिल्ली से टेलीग्राम आया है। बहुत अहम है।
(सीएम सिर घुमाते हैं। पीएस आगे बढ़कर लिफाफा मेज़ पर रखता है। मोरारजी पढ़ते हैं। कमरे में सन्नाटा।)
CM (धीरे से): “Bombay to be considered for Union Territory status.” (एक क्षण रुककर) तो दिल्ली को अब बॉम्बे चाहिए… वो इसे अपने दफ्तर से चलाना चाहती है?
(मुख्य सचिव भीतर आते हैं)
CM: मुख्य सचिव जी, आपने पढ़ा?
मुख्य सचिब: जी सर।
CM: जड़ काट देने से पेड़ कभी फलता-फूलता देखा है आपने?
मुख्य सचिव: सर, केंद्र का मानना है कि बॉम्बे अगर महाराष्ट्र को मिला, तो यहाँ के अन्य भाषी समुदायों में असंतोष फैलेगा...
CM (बीच में ही): गुजराती विरोध करेंगे... पंजाबी, बंगाली, राजस्थानी… सबकी अलग मांगें उठेंगी!!! और अगर उल्टा हुआ?
मुख्य सचिव: तो मराठी आंदोलन और तेज़ हो जाएगा।
CM: तो दिल्ली को इसका हल यही सूझा है कि बॉम्बे को काटकर एक बॉक्स में बंद कर दिया जाए?
मुख्य सचिव: दिल्ली कहती है कि ये शहर सबका है… इसलिए किसी एक का न रहे।
CM (कटाक्ष के साथ): जो सबका हो, वो अक्सर किसी का नहीं होता मुख्य सचिव जी!
मुख्य सचिव: केंद्र बॉम्बे को राष्ट्रीय संपत्ति मानते हुए इसके तटस्थ रहने की वकालत करता है!
CM: संपत्ति? बॉम्बे कोई गोदाम नहीं है। यहाँ लोग रहते हैं… जो बोलते हैं, सोचते हैं, लड़ते हैं, त्योहार मनाते हैं। यह शहर सिर्फ़ व्यापार से नहीं बना। मराठी माणूस ने इसे अपनी संस्कृति, अस्मिता और भाषा से सींचा है। (रुकते हैं) और सिर्फ व्यापार की बुनियाद पर अगर शहर चलते, तो आज भी देश की राजधानी कलकत्ता होती।
मुख्य सचिव: सर, ये कोई अंतिम निर्णय नहीं है... सिर्फ सिफारिश है!
CM: सिफारिश ही तो वो पहला पत्थर होती है.. जिससे सुदृढ इमारतें भी ढहाई जा सकती हैं।
(टेबल की ओर बढ़ते हैं, ठंडा पड़ा चाय का प्याला देखते हैं)
CM (धीरे, पर दृढ़ता से): मुख्य सचिव जी, शिवाजी महाराज एक सच्चे मराठी थे, मराठी अस्मिता की लड़ाई में उन्होंने कभी दूसरे की भाषा, संस्कृति का अपमान नहीं किया ! उनके राज्य में सभी भाषा-भाषी, सभी धर्मावलंबी एक साथ सुख से जिये ! तो सच्चा मराठी जब अपनी लड़ाई लड़ता है तो किसी दूसरी को नीचा करके नहीं बल्कि सबको साथ लेकर लड़ता है,-इसलिए दिल्ली को स्पष्ट जवाब दीजिए… शिवाजी महाराज की मराठी अस्मिता का परचम उठाकर चलने वाला यह मानुस झुकेगा नहीं, अपनी पहचान कभी मिटने नहीं देगा यह मराठी मानुस!!
मुख्य सचिव - जी sir (जाने लगता है, अचानक मुड़ता है) sir.. एक व्यक्तिगत प्रश्न करूँ?
CM: जी जी, पूछिये
मुख्य सचिव - क्या बदलाव हमेशा अच्छे होते है?
CM: बदलाव अच्छे-बुरे नहीं होते, बस ज़रूरी होते हैं!
मुख्य सचिव: और ये ज़रूरी बदलाव आज से 50 साल बाद कितने ज़रूरी होंगे यह हम आप आज कल्पना कर सकते हैं?
CM: हर समाज को अपने समय में जीना होता है। आज जो ज़रूरी है, वही हमारी जिम्मेदारी है। आने वाला समय अपने फैसले खुद करेगा, जैसे हमें करने हैं, अभी और यहीं।"
मुख्य सचिव - जी sir तो मै तार का जवाब रेडी करता हूँ।
CM: बेहतर..
(यह वार्तालाप काल्पनिक है, लेकिन घटनाक्रम तकरीबन यही था)

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